आज शिक्षक दिवस है। कुछ ही दिनों पहले मध्य प्रदेश की स्कूली शिक्षा मंत्री ने घोषणा की की शिक्षक राष्ट्र ऋषि के नाम से जाने जाएँगे । अब चूंकि शिक्षक दिवस इतने करीब था तो ऐसा कुछ न कुछ तो होना ही था सरकारें तो घोषणाओं के लिए ही बना करती हैं। सो उस लिहाज़ से ये ठीक भी है। पर जाने क्यों जैसे ही मैंने ये ख़बर पढ़ी बहुत गुस्सा आया । उजलत सी हुई और मन किया मंत्री साहिबा के सामने जाऊं और चिल्लाकर एक सवाल करूँ ऋषि का मतलब जानती हैं आप ? यदि हाँ तो किसने अधिकार दिया की आप इतने पावन शब्द का अपमान कर सकें । क्या सत्ता में आ जाने के बाद ये स्वतः ही मिल जाने वाले जबरन के अधिकारों में से ही एक है?
आप जिन्हें राष्ट्र ऋषि का नाम देने जा रहें हैं उनमे से अधिकतर तो शिक्षक कहलाने के लायक भी नहीं होते ।
यकीन न आए तो मेरे जैसे हजारों विद्यार्थियों से पूछ कर देखिये । आए दिन अखबार में छपने वाली खबरें पढ़ कर देखें ,हर चौथे दिन ही शिक्षकों द्वारा प्रताडित विद्यार्थिओं की खबरें छापा करतीं हैं । और जो अखबार में चाप जातीं हैं वो तो मात्र एक प्रतिशत हैं ये खबरें तो तब छपतीं हैं जब बच्चे के शरीर पर चोट के निशाँ बन जाया करते हैं या फ़िर मानसिक तौर पे प्रताडित छात्र आत्महत्या कर लेतें हैं ।
लोग कहेंगे की हर शिक्षक एक जैसा नहीं होता। हाँ , मैं आपसे पूर्णतः सहमत हूँ । पर इंसान अपनी धारणाएं अपने अनुभव के आधार पर ही बनाया करते हैं और फिर चूंकि घोषणानुसार सारे ही शिक्षकों को राष्ट्र ऋषि कहा जाना है इसलिए मुझे ये सब कहना पड़ रहा है ।
जहाँ तक मैंने समझा है ऋषि वो होतें हैं जो समदृष्टि रखतें हैं ,जो ग्यानी होतें हैं , जो विवेकी होतें हैं । ऐसे गुन विरले ही शिक्षकों में होंगे। पक्षपात जैसी बातें तो मेरा ख्याल क्लास में अब आम बात हो गई है ,और ग्यानी को छोड़ ही दीजिये कईयों को तो अपने ही विषय का ठीक से ज्ञान नहीं होता ।
हाँ इस बात को नकारा नहीं जा सकता की विद्यार्थी भी अब उद्दंड होते जा रहें हैं। पर यहाँ एक बात गौर करने लायक है की आज भी जो शिक्षक ग्यानी हैं ,समदृष्टि रखतें हैं उन्हें आदर मिलता है । यहाँ मुझे अंग्रेजी का एक जुमला याद आता है की-- रिस्पेक्ट इज नोट डेमान्डेड ett इज कमान्देद
और फ़िर पौधा कुम्हला रहा हो तो उसे ज़्यादा देखभाल की ज़रूरत होती है ।
निष्कर्ष ये की सरकार को चाहिए की शिक्षक को शिक्षक ही रहने दे हाँ यदि शिक्षण व्यवस्था को बदलने की कोशिश करें तो मेहरबानी होगी
इस देश में सब से अधिक सरकारी खिलबाड शिक्षा के साथ ही हो रहा है।छः दशक बाद भी कोई राष्ट्रीय शिक्षा नीति नहीं है... इससे दयनीय स्थिति और क्या होगी?
जवाब देंहटाएंस्वागत है।
जवाब देंहटाएंआपने मेहनत तो की है लेकिन लिखने के बाद एक बार उसे दोबारा पढ़ लिया करें। आपका गुस्सा जायज है लेकिन किसी भी राज्य की शिक्षा नीति को गहराई से देखना बहुत जरूरी है। फिर भी लिखते रहें।
जवाब देंहटाएंआपने ब्लॉग का जो टेंपलेट चुना है, वह बहुत भारी है और देर से खुलता है। बदल कर देखिए, शायद इससे और अच्छा मिल जाए।
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है। अपने विचारों का वहां आकर और भी प्रसार करें।
narayan narayan
जवाब देंहटाएंबाकी तो सब कुछ ठीक है.....लेकिन ई जो आपने इस विचार के ऊपर जो मछली तेरा रक्खी है.....उसमें से होकर मेरे विचार भी बह गए.....ही....ही....ही....ही.....मजाक में ही ही लीजियेगा......हम अयिसे ही हैं....बाकी आपने लिखा खूबसूरत है.....इसी तरह चलते रहिये.....!!
जवाब देंहटाएंशब्द पुष्टिकरण
जवाब देंहटाएंदृष्टि सत्यापन.......isko hataa den......setting men jaakar....yaa kisi se poochh kar......!!