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शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

जब से इस धारा पर मनुष्य जाति का प्रादुर्भाव हुआ तब से ही यह कहा जाता रहा है कि, मनुष्य धरती पर ईश्वर की सबसे सुंदर और संपूर्ण कृति है। सुंदर है केवल इसलिए नही की वो देखने में लुभावना है , बल्कि इसलिए क्योंकि वो वो है, जो और कोई जीवित प्राणी इस धरती हो ही नहीं सकता । शारीरिक दक्षता के इलावा जो वस्तु मनुष्यों को जानवरों अन्य जीवधारियों से भिन्न करती आई है वो है मनुष्य का दिमाग अर्थात विचार। मनुष्य की सबसे बड़ी काबिलियत यही है की वो सोच सकता है।
ज़रा ठहरिये । सोचने को तो जानवर भी सोचते हैं , वो भी सोच लिया करते हैं की यदि कुछ खाने की चीज़ सामने है तो उसे मैं खा लूँ ,या यदि कुछ दूरी पर है तो उस तक कैसे पहुंचूं ,किस तरह अपने शरीर को dhoop और बारिश से बचाऊँ आदि -आदि । पर हमारे सोचने में और उनके सोचने में अन्तर है ,अन्तर है सोच के दायरे में ।
अन्य जीवधारियों के सोच के दायरे में वो हैं , उनका अपना शरीर है, और कुछ हद तक अपना परिवार। बस इतना ही । जबकि मनुष्य की सोच का दायरा विशाल है यदि मैं कहूं की ये परिधि अपरिमित है तो ज़्यादा सही होगा । यही अपरिमितता साधारण सोच को विचार में बदल देती है और सोचने वाले को विचार पिंड में ।
सोचिये न हम मानवों के लिए ही विचारने जैसे शब्द क्यों प्रयोग में लाते हैं जानवरों के लिए क्यों नहीं ।
यही विचार है जो मानवता और पशुत्व को वर्गीकृत करता है यही विचार है जो मनुष्य को सौहार्द्र ,विनय ,विश्वास,वीरता ,धेर्य , दया , ममता और सबसे महत्वपूर्ण प्रेम आदि आभूषणों से भूषित करता है । है न कितनी प्यारी और गर्वित होने वाली बात ।
पर न जाने क्या हुआ , ऐसा क्या घटा जो मानव अपने इसी अद्वितीय ,अमूल्य विचार को खोता जा रहा है । वो असीमित परिधि सिकुदिती जा रहीं है ख़ुद तक सिर्फ़ ख़ुद तक और मानव जो कभी विचार पिंड हुआ करता था बनता जा रहा है सिर्फ़ एक शरीर।

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