आह! पूरे दो महीने ३ दिनों के बाद मौका मिल रहा है कुछ लिखने का और मुझे लिखते हुए बहुत खुशी हो रही है हो भी क्यों न आख़िर मैं विचार हूँ व्यक्त हो पाए बिना मुझे चैन कहाँ । ऐसा नहीं की इन दो महीनो में मैं कहीं खो गया था परन्तु प्रकट हुए बिना मेरे अस्तित्व के कोई मायने भी तो नहीं ।
खैर आज जहाँ मुझे मेरे प्राकट्य की खुशी है तो दुःख भी बहुत है । दुःख है ये देख कर की वेश भूषा, अचार व्यवहार ,रहन सहन के साथ दुनिया में भावनाए भी बदल गईं उनके अर्थ भी बदल गए। बदलाव तभी तक अच्छा है जब तक वो उन्नति में सहायक हो और किसी की भावनाओं को आहत न करे,और फ़िर जब भावनाएं किसी एक की नहीं पूरे देश की हो तब तो सर्वथा ग़लत है।
वैसे भी जिस बदलाव की मैं बात करने जा रहा हूँ उसका न ही तो उन्नति से कोई सम्बद्ध है और न तो भावनाओं से कोई वास्ता वो बदलाव बे सर पैर का बदलाव है अब आप ही बताइए एक देश का राष्ट्रगीत जिसे बरसों से अरबों लोग अपना प्राण प्यारा समझ , देश के गौरव का वर्णन समझ गा रहें हैं अपना राष्ट्रधर्म समझ गा रहें हैं उसे अचानक गाने से ये कह कर मना कर देना की वो किसी धर्म विशेष के लिए कुफ्र है क्या भावनाओं का ऐसा बदलाव आपके समझ में आता है मेरे नहीं आता । हाँ ठीक ही है राष्ट्रगीत क्या होता है राष्ट्र क्या होता है ये तो वो लोग ही समझ सकते हैं जिन्होंने २०० साल की गुलामी को महसूस किया होगा , जो अपने ही अस्तित्व के जूझें होंगे, जिन्हें ख़ुद अपने ही देश में अपने ही देश की गौरवगाथा तो छोडिये उसकी बात करने पर भी सज़ा दी जाती थी । जब उन्हें पहली बार अपना राष्ट्रगीत गाने मिला होगा तब कैसे अद्भुत आनंद की प्राप्ति की होगी उन्होंने । उसके हर एक शब्द को अपनी भावनाओं के आंसुओं में पिरोया होगा उन्होंने । उस वक़्त जब सभी (सारे ही धर्मों के लोगों ने)ने मिल कर पहली बार राष्ट्रगीत गया होगा तो उन्हें ऐसा लगा होगा जैसे बरसों से कहीं कैद उनकी आवाज़ उन्हें वापस मिल गई ।
शायद उन सभी लोगों में धर्म की समझ न रही होगी । है न ? या फ़िर वो मूर्ख रहे होंगे जो इतना भी न समझ पाए की राष्ट्रधर्म जैसा तो कुछ होता ही नहीं सच कहा न मैंने ?
सबसे अधिक खेद की बात तो ये की लोगों का एक छोटा सा समूह जो अपने आपको किसी धर्म विशेष का प्रतिनिधि कह कर पूरे धर्म के लोगों को ऐसी बेतुकी आज्ञा देता है वो ये भी नहीं जानता की उस धर्म के लोग उससे सहमत भी हैं या नहीं । उस पर भी बड़ा दुःख ये की जो बात ध्यान देने योग्य भी नहीं उसे हमारे ही देश के राजनेता मात्र कुछ वोटों की लालच में सही कह रहे हैं ।
इस बात को समझो मेरे भाई की जब राष्ट्र की बात आती है तो अपना निजी धर्म कुछ मायने नहीं रखता यदि ऐसा न होता शहीदे आज़म भगत सिंह सिख होते हुए कभी अपने केश न काटते .निजी धर्म कभी भी राष्ट्र धर्म से बड़ा नहीं हो सकता । धर्म की आड़ में देश द्रोह न करो।
मुझे अक्सर महान क्रांतिवीर शहीद अशफाक उल्ला खान साहब का एक शेर याद आता है -
"सुनाएं गम की किसे कहानी ,हमें तो अपने सता रहें हैं,
हमेशा वो सुबहो शाम दिल पर सितम के खंज़र चला रहें हैं,
न कोई इंग्लिश न कोई जर्मन न कोई रुस्सियन न कोई टर्की ,
मिटाने वाले हैं अपने हिन्दी जो आज हमको मिटा रहें हैं
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सोमवार, 9 नवंबर 2009
शनिवार, 5 सितंबर 2009
आज शिक्षक दिवस है। कुछ ही दिनों पहले मध्य प्रदेश की स्कूली शिक्षा मंत्री ने घोषणा की की शिक्षक राष्ट्र ऋषि के नाम से जाने जाएँगे । अब चूंकि शिक्षक दिवस इतने करीब था तो ऐसा कुछ न कुछ तो होना ही था सरकारें तो घोषणाओं के लिए ही बना करती हैं। सो उस लिहाज़ से ये ठीक भी है। पर जाने क्यों जैसे ही मैंने ये ख़बर पढ़ी बहुत गुस्सा आया । उजलत सी हुई और मन किया मंत्री साहिबा के सामने जाऊं और चिल्लाकर एक सवाल करूँ ऋषि का मतलब जानती हैं आप ? यदि हाँ तो किसने अधिकार दिया की आप इतने पावन शब्द का अपमान कर सकें । क्या सत्ता में आ जाने के बाद ये स्वतः ही मिल जाने वाले जबरन के अधिकारों में से ही एक है?
आप जिन्हें राष्ट्र ऋषि का नाम देने जा रहें हैं उनमे से अधिकतर तो शिक्षक कहलाने के लायक भी नहीं होते ।
यकीन न आए तो मेरे जैसे हजारों विद्यार्थियों से पूछ कर देखिये । आए दिन अखबार में छपने वाली खबरें पढ़ कर देखें ,हर चौथे दिन ही शिक्षकों द्वारा प्रताडित विद्यार्थिओं की खबरें छापा करतीं हैं । और जो अखबार में चाप जातीं हैं वो तो मात्र एक प्रतिशत हैं ये खबरें तो तब छपतीं हैं जब बच्चे के शरीर पर चोट के निशाँ बन जाया करते हैं या फ़िर मानसिक तौर पे प्रताडित छात्र आत्महत्या कर लेतें हैं ।
लोग कहेंगे की हर शिक्षक एक जैसा नहीं होता। हाँ , मैं आपसे पूर्णतः सहमत हूँ । पर इंसान अपनी धारणाएं अपने अनुभव के आधार पर ही बनाया करते हैं और फिर चूंकि घोषणानुसार सारे ही शिक्षकों को राष्ट्र ऋषि कहा जाना है इसलिए मुझे ये सब कहना पड़ रहा है ।
जहाँ तक मैंने समझा है ऋषि वो होतें हैं जो समदृष्टि रखतें हैं ,जो ग्यानी होतें हैं , जो विवेकी होतें हैं । ऐसे गुन विरले ही शिक्षकों में होंगे। पक्षपात जैसी बातें तो मेरा ख्याल क्लास में अब आम बात हो गई है ,और ग्यानी को छोड़ ही दीजिये कईयों को तो अपने ही विषय का ठीक से ज्ञान नहीं होता ।
हाँ इस बात को नकारा नहीं जा सकता की विद्यार्थी भी अब उद्दंड होते जा रहें हैं। पर यहाँ एक बात गौर करने लायक है की आज भी जो शिक्षक ग्यानी हैं ,समदृष्टि रखतें हैं उन्हें आदर मिलता है । यहाँ मुझे अंग्रेजी का एक जुमला याद आता है की-- रिस्पेक्ट इज नोट डेमान्डेड ett इज कमान्देद
और फ़िर पौधा कुम्हला रहा हो तो उसे ज़्यादा देखभाल की ज़रूरत होती है ।
निष्कर्ष ये की सरकार को चाहिए की शिक्षक को शिक्षक ही रहने दे हाँ यदि शिक्षण व्यवस्था को बदलने की कोशिश करें तो मेहरबानी होगी
आप जिन्हें राष्ट्र ऋषि का नाम देने जा रहें हैं उनमे से अधिकतर तो शिक्षक कहलाने के लायक भी नहीं होते ।
यकीन न आए तो मेरे जैसे हजारों विद्यार्थियों से पूछ कर देखिये । आए दिन अखबार में छपने वाली खबरें पढ़ कर देखें ,हर चौथे दिन ही शिक्षकों द्वारा प्रताडित विद्यार्थिओं की खबरें छापा करतीं हैं । और जो अखबार में चाप जातीं हैं वो तो मात्र एक प्रतिशत हैं ये खबरें तो तब छपतीं हैं जब बच्चे के शरीर पर चोट के निशाँ बन जाया करते हैं या फ़िर मानसिक तौर पे प्रताडित छात्र आत्महत्या कर लेतें हैं ।
लोग कहेंगे की हर शिक्षक एक जैसा नहीं होता। हाँ , मैं आपसे पूर्णतः सहमत हूँ । पर इंसान अपनी धारणाएं अपने अनुभव के आधार पर ही बनाया करते हैं और फिर चूंकि घोषणानुसार सारे ही शिक्षकों को राष्ट्र ऋषि कहा जाना है इसलिए मुझे ये सब कहना पड़ रहा है ।
जहाँ तक मैंने समझा है ऋषि वो होतें हैं जो समदृष्टि रखतें हैं ,जो ग्यानी होतें हैं , जो विवेकी होतें हैं । ऐसे गुन विरले ही शिक्षकों में होंगे। पक्षपात जैसी बातें तो मेरा ख्याल क्लास में अब आम बात हो गई है ,और ग्यानी को छोड़ ही दीजिये कईयों को तो अपने ही विषय का ठीक से ज्ञान नहीं होता ।
हाँ इस बात को नकारा नहीं जा सकता की विद्यार्थी भी अब उद्दंड होते जा रहें हैं। पर यहाँ एक बात गौर करने लायक है की आज भी जो शिक्षक ग्यानी हैं ,समदृष्टि रखतें हैं उन्हें आदर मिलता है । यहाँ मुझे अंग्रेजी का एक जुमला याद आता है की-- रिस्पेक्ट इज नोट डेमान्डेड ett इज कमान्देद
और फ़िर पौधा कुम्हला रहा हो तो उसे ज़्यादा देखभाल की ज़रूरत होती है ।
निष्कर्ष ये की सरकार को चाहिए की शिक्षक को शिक्षक ही रहने दे हाँ यदि शिक्षण व्यवस्था को बदलने की कोशिश करें तो मेहरबानी होगी
शुक्रवार, 28 अगस्त 2009
जब से इस धारा पर मनुष्य जाति का प्रादुर्भाव हुआ तब से ही यह कहा जाता रहा है कि, मनुष्य धरती पर ईश्वर की सबसे सुंदर और संपूर्ण कृति है। सुंदर है केवल इसलिए नही की वो देखने में लुभावना है , बल्कि इसलिए क्योंकि वो वो है, जो और कोई जीवित प्राणी इस धरती हो ही नहीं सकता । शारीरिक दक्षता के इलावा जो वस्तु मनुष्यों को जानवरों अन्य जीवधारियों से भिन्न करती आई है वो है मनुष्य का दिमाग अर्थात विचार। मनुष्य की सबसे बड़ी काबिलियत यही है की वो सोच सकता है।
ज़रा ठहरिये । सोचने को तो जानवर भी सोचते हैं , वो भी सोच लिया करते हैं की यदि कुछ खाने की चीज़ सामने है तो उसे मैं खा लूँ ,या यदि कुछ दूरी पर है तो उस तक कैसे पहुंचूं ,किस तरह अपने शरीर को dhoop और बारिश से बचाऊँ आदि -आदि । पर हमारे सोचने में और उनके सोचने में अन्तर है ,अन्तर है सोच के दायरे में ।
अन्य जीवधारियों के सोच के दायरे में वो हैं , उनका अपना शरीर है, और कुछ हद तक अपना परिवार। बस इतना ही । जबकि मनुष्य की सोच का दायरा विशाल है यदि मैं कहूं की ये परिधि अपरिमित है तो ज़्यादा सही होगा । यही अपरिमितता साधारण सोच को विचार में बदल देती है और सोचने वाले को विचार पिंड में ।
सोचिये न हम मानवों के लिए ही विचारने जैसे शब्द क्यों प्रयोग में लाते हैं जानवरों के लिए क्यों नहीं ।
यही विचार है जो मानवता और पशुत्व को वर्गीकृत करता है यही विचार है जो मनुष्य को सौहार्द्र ,विनय ,विश्वास,वीरता ,धेर्य , दया , ममता और सबसे महत्वपूर्ण प्रेम आदि आभूषणों से भूषित करता है । है न कितनी प्यारी और गर्वित होने वाली बात ।
पर न जाने क्या हुआ , ऐसा क्या घटा जो मानव अपने इसी अद्वितीय ,अमूल्य विचार को खोता जा रहा है । वो असीमित परिधि सिकुदिती जा रहीं है ख़ुद तक सिर्फ़ ख़ुद तक और मानव जो कभी विचार पिंड हुआ करता था बनता जा रहा है सिर्फ़ एक शरीर।
ज़रा ठहरिये । सोचने को तो जानवर भी सोचते हैं , वो भी सोच लिया करते हैं की यदि कुछ खाने की चीज़ सामने है तो उसे मैं खा लूँ ,या यदि कुछ दूरी पर है तो उस तक कैसे पहुंचूं ,किस तरह अपने शरीर को dhoop और बारिश से बचाऊँ आदि -आदि । पर हमारे सोचने में और उनके सोचने में अन्तर है ,अन्तर है सोच के दायरे में ।
अन्य जीवधारियों के सोच के दायरे में वो हैं , उनका अपना शरीर है, और कुछ हद तक अपना परिवार। बस इतना ही । जबकि मनुष्य की सोच का दायरा विशाल है यदि मैं कहूं की ये परिधि अपरिमित है तो ज़्यादा सही होगा । यही अपरिमितता साधारण सोच को विचार में बदल देती है और सोचने वाले को विचार पिंड में ।
सोचिये न हम मानवों के लिए ही विचारने जैसे शब्द क्यों प्रयोग में लाते हैं जानवरों के लिए क्यों नहीं ।
यही विचार है जो मानवता और पशुत्व को वर्गीकृत करता है यही विचार है जो मनुष्य को सौहार्द्र ,विनय ,विश्वास,वीरता ,धेर्य , दया , ममता और सबसे महत्वपूर्ण प्रेम आदि आभूषणों से भूषित करता है । है न कितनी प्यारी और गर्वित होने वाली बात ।
पर न जाने क्या हुआ , ऐसा क्या घटा जो मानव अपने इसी अद्वितीय ,अमूल्य विचार को खोता जा रहा है । वो असीमित परिधि सिकुदिती जा रहीं है ख़ुद तक सिर्फ़ ख़ुद तक और मानव जो कभी विचार पिंड हुआ करता था बनता जा रहा है सिर्फ़ एक शरीर।
शनिवार, 22 अगस्त 2009
हमने कहीं एक कहानी पढ़ी, सुनना चाहते हैं -एक बार एक जंगल में एक भेड़ ने छोटे से शेर के बच्चे को देखा। वो अपने परिवार से बिछुड़ गया था भेड़ को शावक पर दया आ गई उसकी ममता जागी और उसने उस शावक को पालने की जिम्मेदारी उठा ली ।
धीरे धीरे वो शावक बड़ा होने लगा और जाहिर है एक दिन वो अपनी माता से भी ऊँचा पूरा हो गया । ये तो होना ही था आखिर वो एक शेर था । कभी कभी भेड़ को उससे डर लगता पर फ़िर वो सोचती ये मुझे नुक्सान नही पहुँचा सकता आखिर ये मेरा बेटा है ।
हमने ये कहानी इसलिए नहीं कही क्योंकि हमें कहानी कहना पसंद है या आप इसे सुनकर प्रसन्न होंगे हमने ये कहानी कही क्योंकि ये आवाहन है हम सभी भेड़ के समूह में रहने वालों शेरो के लिए आइये हम प्रयत्न करें सुनाने के लिए उस गर्जना को जो हममे छुपा नरसिंह जगाएगी वो हम कहीं और से नहीं अपने ही अन्दर से सुनेंगे ।
(ये कहानी और ये पूरा लेख प्रेरित है महान लेखक स्वेट मार्टिन की जो चाहें सो कैसे पाएं किताब से)
धीरे धीरे वो शावक बड़ा होने लगा और जाहिर है एक दिन वो अपनी माता से भी ऊँचा पूरा हो गया । ये तो होना ही था आखिर वो एक शेर था । कभी कभी भेड़ को उससे डर लगता पर फ़िर वो सोचती ये मुझे नुक्सान नही पहुँचा सकता आखिर ये मेरा बेटा है ।
एक दिन जब वो सिंह पुत्र अपनी भेद माता के साथ खेल रहा था तभी पास की एक ऊँची पड़ी से गर्जना सुने दी -सिंह गर्जन मीलों दूर तक के दिलों को दहला देने वाला सिंह गर्जन । शावक ने देखा की उस दहाड़ को सुनते ही सारे जीव और उसकी स्वयं की माता भी भय से कांपने लगे सारे जंगल में अफरा -तफरी मच गई चारों और जीव अपने अपने चेहरों पैर मृत्यु का भय लिए बस भाग रहें हैं ,बस भाग रहें हैं ।पर यदि ये गर्जना इतनी ही भयंकर थी तो उस किशोर सिंह को उसने डराया क्यों नहीं ? क्यों उसे ऐसा लगा जैसे ये आवाज़ उसकी जानी पहचानी है जैसे शायद ये उसी की हगे उसने उसी पल आँखे बंद कर दो क्षण सोचा और महसूस किया ये भयंकर गर्जन वो भी उत्पन्न कर सकता है । ये ताकत तो उसमे भी है । उसकी गर्भी सारे हृदयाधारियों में भय उत्पन्न कर सकती है उसने अभी तक अपनी इस ताकत को पहचाना क्यों नहीं ? आजतक तो उसने येही सोचा था की वो भेड़ की तरह मिमिया सकता है पर आज उसे लगा की वो कुछ और हिया बहुत अलग ,बहुत अलग शायद ताकत का एक जखीरा उसका समूह तो कहीं और है और ये गर्जना यथार्थ में पुकार थी उसके लिए । बस यही सोचकर वो उठा , और चल दिया । क्षण भर पलट कर अपनी भेद माता को अश्रु पूरित नेत्रों से देखने के बाद वो बस चल दिया कभी वापस न आने के लिए एक महाशक्ति की और जो बरसों से उसके भीतर थी पर इसका पता उसे तब चला जब किसी ने गर्जना कर उसे ललकारा ।
इस तरह एक सिंह भेड़ों के समूह से निकल कर राजा बन गया ।हमने ये कहानी इसलिए नहीं कही क्योंकि हमें कहानी कहना पसंद है या आप इसे सुनकर प्रसन्न होंगे हमने ये कहानी कही क्योंकि ये आवाहन है हम सभी भेड़ के समूह में रहने वालों शेरो के लिए आइये हम प्रयत्न करें सुनाने के लिए उस गर्जना को जो हममे छुपा नरसिंह जगाएगी वो हम कहीं और से नहीं अपने ही अन्दर से सुनेंगे ।
(ये कहानी और ये पूरा लेख प्रेरित है महान लेखक स्वेट मार्टिन की जो चाहें सो कैसे पाएं किताब से)
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