ये दुनिया बड़ी विचित्र है , यूं ही पुराने अखबार देखते हुए २१ दिसम्बर का अख़बार सामने आया ,अचानक एक खबर पर नज़र गयी पढ़कर मन में कई सारे भाव एक साथ आ गए - आश्चर्य ,ख़ुशी , दुःख ,तसल्ली ।खबर कुछ इस प्रकार है -
" खमरिया के इ डी के क्षेत्र में स्थित पानी की टंकी में पिछले दिनों एक बन्दर की जान बचानेकी लिए १४ बंदरो ने जान की बाज़ी लगाकर उसे बचाने के लिए टंकी में छलांग लगा दी थी ,और सभी बंदरों की मौत हो गयी ......."
खबर तो बहुत बड़ी थी पर मुझे बस इतनी ही काम की लगी । असल में इतनी ही खबर लगी क्योंकि खबर की परिभाषा के अनुसार वो घटना जिसकी सम्भावना न के बराबर हो खबर मानी जाती है ,अतः शेष कोई खबर नही थी वो सब तो हमेशा ही छापा जाता है वन विभाग की नाकामी के किस्से ,इसमें कुछ भी नया नही।
इस खबर को पढ़कर मुझे आश्चर्य हुआ यह सोचकर की बन्दर जिन्हें हम इंसान, जानवर कहते है, उनमे इतनी इंसानियत कहाँ से आई ,कहाँ से आई यूं दूसरों के लिए जान देने की भावना उन जानवरों में।
फिर मुझे उनकी इसी इंसानियत के बारे में सोचते हुए बहुत ख़ुशी हुई ,बहुत प्यार आया उन बेजुबानो पर ,एक क्षण उनकी मौतों पर रो लेने को जी किया । परन्तु थोड़ी ही देर बाद मेरे दुःख ने दिशा बदली ,और मुझे कुछ याद आने लगा ,ख़बरें ढेर सारी ख़बरें जो मैंने कभी न कभी सुनी या पढ़ी थी। खबर किसी निरपराध की के क़त्ल की ,खबर किसी कमज़ोर की बेरहमी से पिटाई की ,खबर किसी स्त्री से अभद्रता की ,खबर किसी बीवी की पिटाई की और ऐसी ही अनेक ख़बरें । इन सभी ख़बरों में एक बात एक सी थी वो थी एक भीड़ , जो इन सभी अमानुषी अत्याचारों की गवाह थी , वो भीड़ थी तथाकथित इंसानों की । हम इंसानों की जो जानवरों को हर बार जानवर कहते हुए अपने मन में अपने इंसान होने और जानवरों से श्रेष्ठ होने पर गर्व किया करते हैं ये श्रेष्ठता आखिर है क्या ? क्या है अंतर इंसान और जानवर में ? क्या शारीरिक आकर?या क्या थोड़ी अधिक बुद्धि ? या फिर क्या इंसानियत?
यदि शारीरिक आकार और थोड़ी अधिक बुद्धि यही इंसान की पहचान है तो फिर इंसानियत क्या है ? इंसान और इंसानियत इन दो शब्दों में इतनी समानता क्यों है ? ऐसा क्यों लगता है जैसे इंसान और इंसानियत ,मानव और मानवता इनका गहरा संबंध है ? और यदि ऐसा है तो फिर कहाँ गयी थी उस इंसानी भीड़ की इनसानियत क्यों किसी अपने ही जैसे की चीख पर उनका दिल नही पसीजा ? क्यों किसी अपने ही जैसे का दर्द उन्हें महसूस नही हुआ? क्यों किसी अपने ही जैसे की आँख का आंसू उनकी आँख नाम नही कर पाया ?
ये सारे अहसासात , ये सारी भावनाए मुझे सिखाई गयी इंसानियत की परिभाषा यही थी ,मुझे ही नही हर इंसान को सिखाई गयी इंसानियत की परिभाषा यही है । फिर क्या हमारी वो श्रेष्ठता हमारी वो अधिक बुद्धि इस परिभाषा को समझने के लिए काफी नही है।
इस खबर को पढ़कर ये अहसास होता है की कुछ जान लेना और उसे समझ लेना ये दो अलग अलग बातें है । कितनी अजीब बात है न ,बन्दर हमारे पूर्वज कहे जाते हैं ऐसा लगता है की बंदरों से इंसानो तक का विकास हमारी मानवता को खा गया ।
अंत में मेरे मन में एक तसल्ली है की चलो इस दुनिया में कहीं तो इंसानियत बची है हम इंसानों में न सही तो जानवरों में ही सही .