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गुरुवार, 7 अगस्त 2014

लोग कहते थे मैं बोलता नहीं
मेरे लफ़्ज़ों से हुइ तकलीफ़ तुम्हें सो कैसे..

गुरुवार, 26 जून 2014

Bas aise hi..

कभी महसूस किया है अफसाेस कि किसी कागज़ पर बैठा एक छाेटा सा कीड़ा जाे बस अंगुली लग जाने से एक लकीर में तब्दील हाे गया ..
ऐसा क्याें हाेता है?
क्याेंकि वाे बहुत छाेटा हाेता है न ..इतना छाेटा कि हमारी आँखें उसे देख भी नहीं पातीं..आैर सिर्फ छाेटा हाेना उसकि जान ले बैठता है..
खैर जाने दीजिए ...यहां सभी अपना अपना भाग्य जीते और मरते हैं,हम एक अलहदा बात पर विचार करते हैं,
जानते हैं से.मी. क्या है? जी हां लंबाई मापने की इकाई.
१ से.मी. यानि -----------हां लगभग इतना ही बड़ा शायद..
१मीटर=१०० से.मी.
१कि.मी.=१००० मी.
१०० किमी=१०००००मी.

और एक प्रकाशवर्ष?
रुकिए रुकिए ये गणित साधारण हाेते हुए भी उतना साधारण नहीं..
प्रकाशवर्ष यानि lightyear  ये भी लंबाई नापने की इकाई जिससे ब्रम्हांड की दूरियां नापी जाती हैं..
१प्रकाशवर्ष = 9.4605284 ×10^12 कि.मी.
                = 9.4605284 ×1000000000000 किमी
                 = 9.4605284 × 1000000000000000 मी.
और जानते हैं हमारे ब्रम्हांड का व्यास यानि diameter कितना है?
10^8 प्रकाशवर्ष
यानि  100000000 प्रकाशवर्ष
= 9.4605284 × 10000000000000000000000000 सेमी
और अब तनिक विचार कीजिए मनुष्य पर

जिसकी औसत ऊंचाई 125 सेमी और औसत चौड़ाई  50 सेमी.....
बस ..
ज़रा इसकी तुलना ऊपर ब्रम्हांड के व्यास से करिए और सोचिए ..
कहीं हमारी औकात उस लकीर बन जाने वाले कीड़े से भी कम तो नहीं?

गुरुवार, 13 जनवरी 2011

जानवरों की इंसानियत

ये दुनिया बड़ी विचित्र है , यूं ही पुराने अखबार देखते हुए २१ दिसम्बर का अख़बार सामने आया ,अचानक एक खबर पर नज़र गयी पढ़कर मन में कई सारे भाव एक साथ आ गए - आश्चर्य ,ख़ुशी , दुःख ,तसल्ली ।
खबर कुछ इस प्रकार है -
" खमरिया के इ डी के क्षेत्र में स्थित पानी की टंकी में पिछले दिनों एक बन्दर की जान बचानेकी लिए १४ बंदरो ने जान की बाज़ी लगाकर उसे बचाने के लिए टंकी में छलांग लगा दी थी ,और सभी बंदरों की मौत हो गयी ......."

खबर तो बहुत बड़ी थी पर मुझे बस इतनी ही काम की लगी । असल में इतनी ही खबर लगी क्योंकि खबर की परिभाषा के अनुसार वो घटना जिसकी सम्भावना न के बराबर हो खबर मानी जाती है ,अतः शेष कोई खबर नही थी वो सब तो हमेशा ही छापा जाता है वन विभाग की नाकामी के किस्से ,इसमें कुछ भी नया नही।

इस खबर को पढ़कर मुझे आश्चर्य हुआ यह सोचकर की बन्दर जिन्हें हम इंसान, जानवर कहते है, उनमे इतनी इंसानियत कहाँ से आई ,कहाँ से आई यूं दूसरों के लिए जान देने की भावना उन जानवरों में।

फिर मुझे उनकी इसी इंसानियत के बारे में सोचते हुए बहुत ख़ुशी हुई ,बहुत प्यार आया उन बेजुबानो पर ,एक क्षण उनकी मौतों पर रो लेने को जी किया । परन्तु थोड़ी ही देर बाद मेरे दुःख ने दिशा बदली ,और मुझे कुछ याद आने लगा ,ख़बरें ढेर सारी ख़बरें जो मैंने कभी न कभी सुनी या पढ़ी थी। खबर किसी निरपराध की के क़त्ल की ,खबर किसी कमज़ोर की बेरहमी से पिटाई की ,खबर किसी स्त्री से अभद्रता की ,खबर किसी बीवी की पिटाई की और ऐसी ही अनेक ख़बरें । इन सभी ख़बरों में एक बात एक सी थी वो थी एक भीड़ , जो इन सभी अमानुषी अत्याचारों की गवाह थी , वो भीड़ थी तथाकथित इंसानों की । हम इंसानों की जो जानवरों को हर बार जानवर कहते हुए अपने मन में अपने इंसान होने और जानवरों से श्रेष्ठ होने पर गर्व किया करते हैं ये श्रेष्ठता आखिर है क्या ? क्या है अंतर इंसान और जानवर में ? क्या शारीरिक आकर?या क्या थोड़ी अधिक बुद्धि ? या फिर क्या इंसानियत?

यदि शारीरिक आकार और थोड़ी अधिक बुद्धि यही इंसान की पहचान है तो फिर इंसानियत क्या है ? इंसान और इंसानियत इन दो शब्दों में इतनी समानता क्यों है ? ऐसा क्यों लगता है जैसे इंसान और इंसानियत ,मानव और मानवता इनका गहरा संबंध है ? और यदि ऐसा है तो फिर कहाँ गयी थी उस इंसानी भीड़ की इनसानियत क्यों किसी अपने ही जैसे की चीख पर उनका दिल नही पसीजा ? क्यों किसी अपने ही जैसे का दर्द उन्हें महसूस नही हुआ? क्यों किसी अपने ही जैसे की आँख का आंसू उनकी आँख नाम नही कर पाया ?

ये सारे अहसासात , ये सारी भावनाए मुझे सिखाई गयी इंसानियत की परिभाषा यही थी ,मुझे ही नही हर इंसान को सिखाई गयी इंसानियत की परिभाषा यही है । फिर क्या हमारी वो श्रेष्ठता हमारी वो अधिक बुद्धि इस परिभाषा को समझने के लिए काफी नही है।
इस खबर को पढ़कर ये अहसास होता है की कुछ जान लेना और उसे समझ लेना ये दो अलग अलग बातें है । कितनी अजीब बात है न ,बन्दर हमारे पूर्वज कहे जाते हैं ऐसा लगता है की बंदरों से इंसानो तक का विकास हमारी मानवता को खा गया ।

अंत में मेरे मन में एक तसल्ली है की चलो इस दुनिया में कहीं तो इंसानियत बची है हम इंसानों में न सही तो जानवरों में ही सही .

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

मेरे विश्वास का पत्थर......



जय शिवशम्भू ! जय श्रीराम !




नमस्ते दोस्तों ! कैसे हैं ? आज मुझे एक बड़ी रोचक घटना याद आई , घटना में कुछ ऐसी बातें हैं जो सिर्फ मेरे भारत में ही हो सकती हैं बात की शुरुआत के लिए हम समय में थोडा आगे .... नही पीछे चलते हैं बात उस समय की है जब हम बहुत छोटे हुआ करते थे मनुष्य जब जन्म लेता है ,तब कुछ रिश्ते तो ईश्वर उसे उसी समय भेंट कर देते हैं ,पर कुछ ऐसे रिश्ते होते हैं जो भगवान् जिंदगी में थोड़ी खोज के बाद ही देते हैं ऐसा ही एक रिश्ता होता है अपने इष्ट से कोई माने या माने ये एक ऐसा रिश्ता है जिसके बिना इंसान का जी पाना मुश्किल है ,क्योंकि जीने के लिए विश्वास यहीं से मिलता है यूँ तो माता-पिता ही भगवान् से बच्चे का परिचय करा देते हैं , परन्तु समझ विकसित होने पर इंसान जिसे अपने इष्ट के रूप में चुनता है वोही मायने रखता है

हाँ एक बड़ी महत्वपूर्ण बात ये है की ये जो मैंने इतनी सारी बातें यहाँ कहीं वो हिन्दुस्तान से बाहर किसी की समझ में नही सकती . वास्तव में केवल हिन्दुस्तान कहना भी गलत होगा ,मुझे हिन्दू धर्म कहना चाहिए क्योंकि ईश्वर के जितने रूप इस महान धर्म में पूजे जाते हैं उतने शायद ही और कहीं पूजे जाते होंगे .खैर छोडिये हम तो अपनी बात कर रहे थे


हाँ तो उन दिनों जब हम एक बच्चे थे ,हम भी अपने इष्टदेव को ढूँढा करते थे मेरे पास विकल्प कई सारे थे ,और बुद्धि थी एक मनुष्य की ,और उस पर भी एक बच्चे की समझ ही नही आता था की आखिर चुने किसे?
सामान्यतः बच्चे उन्ही से पहले परिचित होते हैं जिनकी पहचान उनके माता -पिता से होती है ,,सो मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। मेरे माता -पिता मुख्यतः माता महाकाली की ही पूजा करते हैं तो उस वक़्त मैंने सोचा चलो यही राह अच्छी है। सो कुछ दिनों मैंने दुर्गा चालीसा का पाठ करना शुरू किया ,और भी जो जो मेरी बुद्धि ने मुझसे कहा मैंने वैसी वैसी माँ की पूजा अर्चना की लेकिन कुछ ही दिनों बाद अचानक मेरे मन में भगवान् शंकर के प्रति आकर्षण जागा हो सकता है उन दिनों मैंने उनकी कोई कहानी पढ़ ली हो या फिर कोई फिल्म देख ली हो

बस इसी दौरान की बात मुझे आपको बतानी है जब मेरी लगन भगवान् शंकर के चरणों में लगी हुई थी उन दिनों हम नित्यप्रति पूजा मैं बैठे बट्टइया रुपी भगवान् शंकर को खूब प्रेम से नहलाते, चन्दन लगाते , खिलाते ,पिलाते और भी जो जो बनता वो वो करते थे



अब चूंकि हमारे यहाँ शंकर जी की कोई मूर्ती वगेरह नही है तो शंकर जी के नाम पर हमारे मन में बटइयें ही आया करती थीं । ऐसा नही की हमने कभी शंकर जी की कोई मूर्ति देखि नही थी, परन्तु अब भाई जिन्हें रोज़-रोज़ सम्पूर्ण भाव से शंकर जी मान कर पूजा वो तो बटइया रूप में ही थे न ।

हमारे घर में मुख्य सड़क तक एक गली जाती है जिसमे असंख्य तरह-तरह के पत्थर पड़े रहते हैं । एक दिन वहां से गुजरते हुए हमने देखा की एक पत्थर बिलकुल शिव जी की बटइया के जैसा धुल में पड़ा है तब मेरे मन ने कहा की ये तो बड़ी गलत बात है जिनकी पूजा करनी चाहिए वो धूल में पड़े हैं सो बस हमने उस पत्थर या यूं कहिये अपने शिवजी को उठाया उन्हें नहलाया , उनकी पूजा की और मन बनाया की इन्हें भी पूजा में रखना चाहिये ।


मैंने अपनी इच्छा परिवार वालों को बताई पर माँ को मेरी बात कुछ पसंद नही आई उन्होंने मना कर दिया लेकिन अब हमारे लिए तो ये नामुमकिन था की जिस पत्थर को शिव जी बना कर लाये उसे फिर से पत्थर बना कर वहीँ छोड़ आएं आखिर उसके साथ मेरा विश्वास जुड़ गया था कुछ देर बाद इस समस्या का हल निकला वो ये की पूजाघर के सामने जो गमला है वहीँ इन नए-नए शिव जी की स्थापना कर दी जाए

मुझे ख़ुशी हुई की चलो मेरे शिवजी को स्वीकृति तो मिल गयी अब रोज़ ही हम अपने शिवजी की बड़े मन से पूजा किया करते सारी बटइयों के साथ उन्हें भी स्नान कराते ,चन्दन लगाते आदि-आदि हमारे यहाँ भोग के लिए केवल तीन ही थालियाँ निकाली जाती हैं और ये माना जाता है की जितने भी भगवान् पूजा में बैठे हैं वो सभी उन्ही में से भोजन ग्रहण करेंगे

अब हमारे लिए नइ समस्या आई हमने सोचा हमारे शिवजी तो बाहर बैठे हैं वो कैसे भोजन करेंगे अतः हमने अपने लिए एक नया काम निर्धारित किया रोज़ भोग के समय अपने शिवजी को अलग से भोग लगाना।

इस तरह हमारी पूजा अर्चना बड़े ही सुखद ढंग से चलने लगी समय बीतता गया और हमे ठीक से याद भी नही कब अचानक हमने अपने शिवजी को गमले से उठा कर पूजा में बाकी बटइयों के साथ रख लिया हाँ इतना जरूर याद है की थोड़े दिन तक माँ ने मुंह बनाया था . लेकिन समय बीतते बीतते मेरे शिवजी अब सार्वजनिक शिवजी बन चुके हैं इस तरह मेरे विश्वास का पत्थर पूजा जाने लगा . सब शिवजी की इच्छा .


हाँ वैसे एक बात और बता दें शिवजी पर आकर हमारी ईष्ट देव की तलाश रुकी नही . वो हनुमानजी से होती हुई भगवान् श्रीराम पर आकर ख़त्म हुई और आज हम आपको पूरे विश्वास से कह सकते हैं की हमारे इष्टदेव भगवन श्रीराम ही हैं और वोही रहेंगे.
जय श्रीराम!
जय शिवशंकर!
जय भारत !

शनिवार, 9 जनवरी 2010

        आख़िरकार आज हॉकी खिलाडियों ने बगावत कर ही दी . मुझे तो ताज्जुब इस बात का है की इसमें इतनी देर क्यों हुई , उन्हें तो ये बहुत पहले कर देना चाहिए था . क्या हमारे लिए ये शर्म की बात नहीं है की हमारे देश में हमारे घोषित राष्ट्रीय खेल की यह दशा है की उसके खिलाडियों को वेतन तक नहीं मिलता . अभी तक तो यही सुन कर दुःख होता रहा था की खेल के अभ्यास के लिए, उसकी उन्नति के लिए पर्याप्त साधनों की कमी है पर अब खिलाडियों को उनका वेतन तक न मिलना तो हद ही  हो गयी  .उस पर ऐसा भी नहीं है की हमारे देश की हालत इतनी खराब है की खेल विकास के लिए हम खर्च नहीं कर सकते क्रिकेट के लिए  किया जाने वाला खर्च उसके खिलाडियों की कमाई किसी से छुपी नहीं .
      कैसी विडम्बना है ? क्या हम इस बात का सबूत देना चाहते हैं कि ये जो कहा जाता है कि गुलामी अब हमारे खून के साथ बहने लगी है, सच है अंग्रेजो के दिए  इस खेल की हमारे देश कितनी खातिर और हमारे ही चुने हुए राष्ट्रीय खेल की ये दशा  .
      मेरा कहना ये नहीं है की हम क्रिकेट को बढ़ावा देना बंद कर दें तथा  खिलाडियों को दिया जाने वाला प्रोत्साहन बंद कर दें  परन्तु हॉकी के साथ इस सौतेले व्यवहार कि वजह ? जिसे कभी राष्ट्रीय खेल का दर्ज़ा देकर सम्मानित किया था यूँ अब उसका अपमान करना तो सरासर गलत है.
      हिन्दुस्तान जहाँ हर क्षेत्र में तरक्की कर रहा है वहां हम अपने ही राष्ट्रीय खेल में पिछड़े हैं  उसके विकास के लिए हमारे पास पर्याप्त साधन नहीं हैं ये बात बड़ी लज्जाजनक है .
       केवल खिलाडियों के ख़राब प्रदर्शन पर उनकी आलोचना करना ही तो हमारा काम नहीं जब तक हम पर्याप्त सुविधाएँ उन्हें उपलब्ध नही करते हम कैसे उनसे अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद कर सकते हैं सरकार को चाहिए की वो जितना खर्च क्रिकेट के लिए करती है उतना ही हॉकी के लिए भी करे बेहतर खेल सुविधाएँ अच्छे मैदान उपलब्ध कराये और खिलाडियों  को कम से कम उनका वेतन तो दे ही.
     पैसा एक बड़ा मुद्दा है  आज क्रिकेटर्स की कमाई देखकर ज्यादातर माता पिता अपने बच्चों को उस खेल में भेजना चाहतें हैं और ज्यादातर बच्चे भी उसमे जाना चाहतें हैं यदि हॉकी खिलाडियों को दिया जाने वाला पैसा बढ़ा दिया जाए तो बेशक उसके खिलाडियों की संख्या में इजाफा होगा

शनिवार, 2 जनवरी 2010

जब मैं जन्मा, मेरे संग जन्मी कला.
मेरी साथी कला,
मुझे लुभाती कला,
जब मैं रोता, मेरे संग रोती कला.
जब मैं हँसता,
मेरे संग हंसती कला.
चमचमाती कला,
जगमगाती कला,
कल्पना का वो मोटी सी आँखों में अंजन .
भावों और चित्रों का गहनो में कंचन .
रचना की पूर्णता के सुन्दर से पाओं में,
रागों की पायल की रुनझुन .
लेकर वो चलती,
गिरती संभालती,
रुक रुक मचलती,
राह में ठहर इठलाती कला
बस यूँही, चाह तक पहुँच जाती कला
मेरी साथी कला