आख़िरकार आज हॉकी खिलाडियों ने बगावत कर ही दी . मुझे तो ताज्जुब इस बात का है की इसमें इतनी देर क्यों हुई , उन्हें तो ये बहुत पहले कर देना चाहिए था . क्या हमारे लिए ये शर्म की बात नहीं है की हमारे देश में हमारे घोषित राष्ट्रीय खेल की यह दशा है की उसके खिलाडियों को वेतन तक नहीं मिलता . अभी तक तो यही सुन कर दुःख होता रहा था की खेल के अभ्यास के लिए, उसकी उन्नति के लिए पर्याप्त साधनों की कमी है पर अब खिलाडियों को उनका वेतन तक न मिलना तो हद ही हो गयी .उस पर ऐसा भी नहीं है की हमारे देश की हालत इतनी खराब है की खेल विकास के लिए हम खर्च नहीं कर सकते क्रिकेट के लिए किया जाने वाला खर्च उसके खिलाडियों की कमाई किसी से छुपी नहीं .
कैसी विडम्बना है ? क्या हम इस बात का सबूत देना चाहते हैं कि ये जो कहा जाता है कि गुलामी अब हमारे खून के साथ बहने लगी है, सच है अंग्रेजो के दिए इस खेल की हमारे देश कितनी खातिर और हमारे ही चुने हुए राष्ट्रीय खेल की ये दशा .
मेरा कहना ये नहीं है की हम क्रिकेट को बढ़ावा देना बंद कर दें तथा खिलाडियों को दिया जाने वाला प्रोत्साहन बंद कर दें परन्तु हॉकी के साथ इस सौतेले व्यवहार कि वजह ? जिसे कभी राष्ट्रीय खेल का दर्ज़ा देकर सम्मानित किया था यूँ अब उसका अपमान करना तो सरासर गलत है.
हिन्दुस्तान जहाँ हर क्षेत्र में तरक्की कर रहा है वहां हम अपने ही राष्ट्रीय खेल में पिछड़े हैं उसके विकास के लिए हमारे पास पर्याप्त साधन नहीं हैं ये बात बड़ी लज्जाजनक है .
केवल खिलाडियों के ख़राब प्रदर्शन पर उनकी आलोचना करना ही तो हमारा काम नहीं जब तक हम पर्याप्त सुविधाएँ उन्हें उपलब्ध नही करते हम कैसे उनसे अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद कर सकते हैं सरकार को चाहिए की वो जितना खर्च क्रिकेट के लिए करती है उतना ही हॉकी के लिए भी करे बेहतर खेल सुविधाएँ अच्छे मैदान उपलब्ध कराये और खिलाडियों को कम से कम उनका वेतन तो दे ही.
पैसा एक बड़ा मुद्दा है आज क्रिकेटर्स की कमाई देखकर ज्यादातर माता पिता अपने बच्चों को उस खेल में भेजना चाहतें हैं और ज्यादातर बच्चे भी उसमे जाना चाहतें हैं यदि हॉकी खिलाडियों को दिया जाने वाला पैसा बढ़ा दिया जाए तो बेशक उसके खिलाडियों की संख्या में इजाफा होगा
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शनिवार, 9 जनवरी 2010
शनिवार, 2 जनवरी 2010
जब मैं जन्मा, मेरे संग जन्मी कला.
मेरी साथी कला,
मुझे लुभाती कला,
जब मैं रोता, मेरे संग रोती कला.
जब मैं हँसता,
मेरे संग हंसती कला.
चमचमाती कला,
जगमगाती कला,
कल्पना का वो मोटी सी आँखों में अंजन .
भावों और चित्रों का गहनो में कंचन .
रचना की पूर्णता के सुन्दर से पाओं में,
रागों की पायल की रुनझुन .
लेकर वो चलती,
गिरती संभालती,
रुक रुक मचलती,
राह में ठहर इठलाती कला
बस यूँही, चाह तक पहुँच जाती कला
मेरी साथी कला
मेरी साथी कला,
मुझे लुभाती कला,
जब मैं रोता, मेरे संग रोती कला.
जब मैं हँसता,
मेरे संग हंसती कला.
चमचमाती कला,
जगमगाती कला,
कल्पना का वो मोटी सी आँखों में अंजन .
भावों और चित्रों का गहनो में कंचन .
रचना की पूर्णता के सुन्दर से पाओं में,
रागों की पायल की रुनझुन .
लेकर वो चलती,
गिरती संभालती,
रुक रुक मचलती,
राह में ठहर इठलाती कला
बस यूँही, चाह तक पहुँच जाती कला
मेरी साथी कला
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